Lihaaz.. लिहाज़..की कहानी

Kosh


लिहाज़! बड़ा ही छोटा सा शब्द है मगर इस छोटे से शब्द  के खातिर बड़े-बड़े त्याग करने होते हैं, और वह भी सिर्फ उन्हें जो पीढ़ियों से चली आ रही इस लिहाज़ नाम के शब्द का मान रखते हैं वरना आज के जमाने में तो लिहाज़ शब्द के मायने ही खत्म होते जा रहे हैं। और हो भी क्यों ना?
इस लिहाज नाम के परदे के पीछे बहुत ही त्याग छुपे होते हैं जो आज के ज़माने की पीढ़ीयां मुश्किल से ही हजम करने को तैयार होती है।

ठीक उसी तरह जैसे "नीना" (काल्पनिक नाम) की लिहाज ने मानो उसकी जिंदगी ही बदल कर रख दी थी।
जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी मेहनत से दिन रात एक कर के एक छोटी सी सरकारी नौकरी निकाली थी जिसकी तनख्वाह से घर के लिए चार रोटी जुटाने व अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए हर रोज परेशानियों से दो-चार होना पड़ता।

कभी उसकी पुरानी सैंडल के फीते बार-बार टूट जाते तो कभी पुराने बैग के टूटी हुई चैन को दुपट्टे से छुपाते क्या सोचती हुई ऑफिस जाती कि इस बार तनख्वाह आते ही सबसे पहले अपने लिए एक सुंदर पर्स खरीदूंगी ।
यह सब सोचते हुए नीना अपने कार्यालय की ओर जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए, सपनों की दुनिया में गोते लगाते आगे बढ़ी रही थी  कि तभी फोन के मैसेज के टिक टिक से इसका ध्यान बट गया..

मगर यह क्या?? फोन की तरफ अभी ध्यान से देख ही रही थी कि उसके सपनों की गोते की दुनिया से कई सपने टूट कर जमीन पर आ गिरे।
इस बार बिजली का बिल पूरे‌ चार सौ तीस रुपए ज्यादा आये थे..
और तो और अभी पिछले माह के राशन का भी बकाया था वह भी तो चुकाना होगा..
यह सब सोचते हुए नीना खुद को समझाती हुई अपने रोजाना की कुर्सी पर टाइपराइटर को संभालते हुए बैठ गयी और काम करने लगी और अपनी इच्छाओं को टाल दिया यह सोच कर के पहले घर के काम जरूरी है।

ऐसा क्यों था?
क्या सिर्फ इसलिए कि नीना घर में सबसे बड़ी थी और जिम्मेदारी नाम का मुहर सिर्फ उसके माथे पर लगा हुआ था? नहीं।
ऐसा इसलिए था क्योंकि नीना अपनी जिम्मेदारियों को समझती थी बड़े बुजुर्गों से सीखे नीना ने अपने संस्कारों को लिहाज की नींव बनाकर संजोए रखा था।
कभी-कभी तो वह खीझ सी जाती कि क्यों उसके अपने ही सगे और चचेरे भाई-बहन उसकी तरह घर में हाथ नहीं बटाते और क्यों वह उसके विचारों का समर्थन भी नहीं करते? बावजूद इसके  क्यों हर महीने के तारीख की तनख्वाह आते ही सब की जरूरत ् मुंह फाड़े नीना के सामने आ जाती? कभी मायूस होती तो कभी यह सोच कर सुबक कर रह जाती कि सभी अपने ही तो है तभी तो इच्छा जताते हैं उससे, मगर एक प्रश्न उसे हमेशा परेशान करता क्यों वह सब के जैसी नहीं है? क्यों नीना को सब की परेशानी सब के दुख सताते हैं ?और क्यों इतना परवाह करती है,आखिर खुद को क्यों बदल नहीं पाती नीना और ‌ क्यों नहीं बन पाती अपने ही भाई बहनों की तरह?
शायद प्राकृतिक रूप से ऐसी ही है वह । जो आज के बदलते समय में अगली पीढ़ियों के अंदर खत्म सी होती जा रही है और वही अब तक बाकी है नीना में जो उसने बचपन से सीखा था "लिहाज़"

अभी कल ही की तो बात है नीना की बहन मुन्नी ने नीना के नए कुर्ते को कटवा कर अपने नाप का करा लिया और कुछ बताना जरूरी नहीं समझा..
इस बात का पता नीना को लगा तो उसने गुस्से से पूछा - मुन्नी तूने मेरा कुर्ता लिया क्या?
मुन्नी (टेढ़ा सा मुंह बनाकर) - मुझे अपने कॉलेज के फंक्शन में पहनने की जरूरत थी सो मैंने ले लिए।
नीना आवाक सी देखती रह गई..
उधर नीना का भाई गोलू हर रोज नीना से नयी चप्पल के लिए लड़ता रहता और मां समझाती कि चुप रह जा, इस बार तनख्वाह आते ही सबसे पहले तेरी चप्पल ही ले आएगी दीदी। क्या करती नीना तीन - चार पढ़ने वाले भाई - बहन जो समझदारी से काम लेना भी नहीं चाहते थे और ना ही नीना की सुनते।

इसमें ना दोष नीना का था ना उसके भाई बहनों का। था तो बदलते वक्त और परिवेश का.. बदलते जमाने और बदलती पीढ़ी का और विलुप्त से होते हुए पुरानी मर्यादा और संस्कार का।
मन ही मन अपने नए कुर्ते के बारे में सोचते हुए नीना आज थोड़ी मायूस थी क्योंकि बड़े दिनों के बाद दिवाली पर उसने नए लिए थे, साथ ही इस बार माह के खर्चों का हिसाब लगाती लगाती नीना दफ्तर के लिए तैयार होकर किवाड़ से बाहर ही निकली थी कि,
मां ने पीछे से आवाज लगाई...

घर के कामों से फुर्सत कहां की मां भी कभी बैठ कर उसकी सुनें और सुनाएं और तो और नीना की तकलीफों से बेखबर के दफ्तर को निकलते वक्त अक्सर ही किसी राशन सब्जी या किसी जरुरी वस्तु की फरमाइश करके अपने कामों में फिर से मशगूल हो जाती..

और फिर से"लिहाज़" नीना से एक और त्याग का करा लेता और उसकी अपनी इच्छाएं अगले महीने की तनख्वाह पर जाकर सपनों की किसी अंधेरी कोठरी में कैद हो जाती...


                          खुशिहाली✍️




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