Gao me गांव में
Kosh
कितने सालो बाद आज फिर,
बैठै गांव की नाव में...
बर्फिली नम झोकों वाली,
पवन वेग बहाव में...
स्मृति में जो डूब रही थी,
जीवंत थी कुछ तिनकों में..
काम - काज में भूली बिसरी,
व्यस्त स्वयं में बिखरी - बिखरी..
ख्याल नहीं यह सत्य समीप मैं,
वापस उन्हीं पड़ाव में..
कितने सालो बाद आज फिर,
बैठै गांव की नाव में...
झिमिर - झिमिर मेघो की बातें,
बैठ इकट्ठे कटती रातें..
नीम आम की बगिया सुंदर,
बगल वही जो बड़ा समंदर..
सब सारा कुछ है घर अपना,
यहीं पुआल की छांव में...
कितने सालो बाद आज फिर,
बैठै गांव की नाव में...
पोखर का वह शीतल जल,
घर के पास पुराना नल...
अपने हाथों से तोड़ा फिर,
आज कुमुदिनी और कमल..
भीगे, घुमे और ठिठुरे फिर,
सेंके हाथ अलाव में...
कितने सालो बाद आज फिर,
बैठै गांव की नाव में...
कितने सालो बाद आज फिर,
बैठै गांव की नाव में...
बर्फिली नम झोकों वाली,
पवन वेग बहाव में...
खुशिहाली✍️