Do pyali ki chay mangayen


दो प्याली की चाय मंगायें,

आओ बैठे बतियाएं....


थोड़ी खुशियों की लह-लह की,

थोड़ी चार बलाएं....

कहीं भोग छप्पन की थाली,

कोई जल पीकर सो जाये...

इनकी - उनकी  इधर - उधर की,

क्षण दो क्षण समझावें..

हाथ ना आवे बात कोई जब

कहेकहे जोर लगावे...


दो प्याली की चाय मंगायें,

आओ बैठे बतियाएं....


बात पड़ोस की झगड़े वाली,

नुक्कड़ पर सुबह नोंक -जोक की...

शाम गली में खींचा-तानी,

चौराहे के तोड़-फोड़ की...

बुढ़िया चाची और बाईं में,

दो रूपए के हंगामे की...

बात अभी परवान चढ़ी थी,

गपशप के तो पर लग आये...


दो प्याली की चाय मंगायें,

आओ बैठे बतियाएं....


चाय आखिरी सुड़क पर आई,

अंदर से अम्मा चिल्लाई..

थर्राई खाट कंपन से,

ऐनक गिरे धरा पर आए...

सखा उठे चलन अपने गृह,

चले बचे काज सुलझायें...

तभी कोई आवाज लगाए,

अरे बाबा..!

क्या हम अंदर आयें..?


दो प्याली की चाय मंगायें,

आओ बैठे बतियाएं....


                               खुशिहाली✍️





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