Khuddari - khudgarji

खुद्दारी ने खुद को बेचा,
खुदगर्जी़ ने बहलाया...

हाय समाज यह निर्मम कितना,
अपनों ने अपनों को ही सताया..
तकलीफ़ जरा ना पूछी,
मन में ख्याल भी ना आया.....
कितने सपने बिखरे होंगे,
रोम-रोम तड़पाया....
सब विस्मित सा हो बैठा है,
यह कैसा खेल रचाया.......

खुद्दारी ने खुद को बेचा,
खुदगर्जी़ ने बहलाया...

समाज ताश-महल जैसा,
यहां है बस पैसा - पैसा...
पूजा और सम्मान इसी का,
आखिर यह नियम कैसा?
फट जाती गरीब की छाती,
कितने जीवन छोड़ चले....
चमक-दमक से मतिभ्रम होकर,
इस अग्नि में सभी जले...
धन की भूख ना कभी मीटी है,
इस छल‌ ने सब को भरमाया.....

खुद्दारी ने खुद को बेचा,
खुदगर्जी ने बहलाया.......

दो पंछी के सपने टूटे,
कितनों के पर काट दिए......
ऐसी अभिलाषा के चलते,
कितने अरमान दान किए....
बल प्रदर्शन - क्रोध प्रदर्शन,
ने ही इसको जन्म दिया है...
मानव से मानव का सौदा,
मानव खरीद के घर लाया.....

खुद्दारी ने खुद को बेचा,
खुदगर्जी ने बहलाया..

खुद्दारी ने खुद को बेचा,
खुदगर्जी ना बहलाया.......

                                       खुशिहाली✍️




















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